भरोसे का क़त्ल: चतुर्थ स्तंभ का पतन

भारतीय टेलीविज़न मीडिया अब एक ऐसा तबका बनता जा रहा है जिस पर धीरे-धीरे भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है। पढ़े-लिखे लोग, जिन्हें सही जानकारी चाहिए होती है, जब सरकारी और गैर-सरकारी चैनलों की ओर रुख करते हैं तो वहां उन्हें पांच जोकर चीखते हुए मिलते हैं और उन पर निगरानी रखने वाला छठा जोकर—जो खुद कुछ कम नहीं होता।

एक ऐसा माहौल बनाया जाता है जहां विज्ञापन की दुनिया के चार स्तंभ—Attraction (आकर्षण), Interest (रुचि), Desire (इच्छा) और Acquisition (प्राप्ति)—का इस्तेमाल कर के दर्शकों और खुद बहस में बैठे लोगों को मूर्ख बनाया जाता है।

मुद्दे वही घिसे-पिटे: धर्म, आरक्षण, टिप्पणी, हिंसा

हर दिन बहस के नाम पर वही पुरानी पटकथा: धर्म का झगड़ा, आरक्षण पर विवाद, किसी धर्म के खिलाफ बयान, भीड़ द्वारा हिंसा, और फिर हिंदू-मुस्लिम की दुहाई। इन मुद्दों पर कोई समाधान नहीं निकलता, बस शोर होता है।

असल समस्या यह है कि ये भ्रष्‍ट चैनल इसलिए फल-फूल रहे हैं क्योंकि दर्शकों को इन तमाशों में मज़ा आता है। और अगर नहीं आता, तो ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि खुद-ब-खुद लोगों की रुचि पैदा हो जाए।

और ये सिर्फ एक पक्ष की बात नहीं—अगर ये चैनल नहीं करेंगे तो विपक्ष समर्थित चैनल इन मुद्दों को जरूर भुनाएंगे।

एक तरफ अंध-सरकार समर्थक, दूसरी ओर कट्टर विरोधी

दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी पत्रकार हैं जो सरकार की आलोचना इस हद तक करते हैं मानो सरकार ने एक भी अच्छा काम किया ही न हो। जैसे श्रीमान कुमार—उनकी पत्रकारिता विरोध की भावना से नहीं, बल्कि एक खास दर्शक वर्ग को खुश रखने की रणनीति से प्रेरित लगती है।

ये लोग सरकार-विरोधी बाजार को साधते हैं और उसी के दम पर अपना पोषण करते हैं। नतीजा ये कि जो आम लोग जानकार नहीं हैं, वो इस झूठी वैचारिक लड़ाई में सच और झूठ का फर्क ही भूल जाते हैं।

जब YouTube भी बिक गया

जब YouTube आया, तो लोगों को उम्मीद जगी कि अब निष्पक्ष पत्रकारिता का दौर लौटेगा। लेकिन क्या हुआ? जैसे ही सरकार ने देखा कि लोग YouTube पर खबरें देखने लगे हैं, उनके प्रवक्ता और समर्थक भी वहां कूद पड़े।

अब YouTube पर इतने “रक्षा विशेषज्ञ” और “भू-राजनीति विश्लेषक” बन चुके हैं कि समझ नहीं आता कि हंसें या सिर पकड़ें।

अगली पीढ़ी को खबर क्या है?

नई पीढ़ी तो दिनभर रील्स में डूबी रहती है। उन्हें तो पता ही नहीं कि अख़बार जैसी कोई चीज़ भी होती थी जहां सच दिखाया जाता था। और जब तक वो समझेंगे, तब तक अख़बार विज्ञापन वाले पंपलेट बन चुके होंगे।

पुराने राजाओं के दरबार में जैसे व्यक्तिगत कवि होते थे, वैसे ही आज की सरकारों के निजी संपादक और चैनल हो गए हैं। और जो सच बोलेगा, उसे नेहा सिंह राठौर की तरह जेल का मुंह देखना पड़ सकता है।

बेरोजगारी अब मुद्दा नहीं रही

देश में बेरोज़गारी अब चर्चा का विषय ही नहीं। अब बेरोज़गारों के हाथ में सस्ता इंटरनेट है, जिससे वो मुफ्त में अश्लील सामग्री या गालियों से भरी वेब सीरीज़ देखते हैं। और जब कभी उन्हें खबर देखने का मन करता है, तब या तो कुत्ते की लड़ाई मिलती है या मोहल्ले की गाली-गलौच।

मैंने तो अब टेलीविज़न चैनलों और अख़बारों से विश्वास ही हटा लिया है। मेरा तरीका अब यह है कि मैं दोनों तरफ की बातें सुनता हूं—जहां सरकार की तारीफ़ होती है, और जहां आलोचना होती है। फिर मैं खुद तय करता हूं कि सही क्या है और गलत क्या है।

क्रिकेट से सीखिए निष्पक्षता

अब आप ही बताइए, जब मुझे धोनी का छक्का भी पसंद है, कोहली का कवर ड्राइव भी और रोहित का पुल शॉट भी, तो मैं क्यों किसी एक का अंधभक्त बनूं? जब मैं तीनों की खूबी देख सकता हूं, तो उनकी कमियां भी बेहतर समझ सकता हूं।

इसी तरह, अगर हम मीडिया के हर पक्ष को समझने की कोशिश करेंगे, तो हम सच्चाई के ज्यादा करीब होंगे।

निष्कर्ष: स्मार्ट बनिए, जागरूक रहिए

आज के दौर में जानकारी शक्ति है—but misinformation is slavery. हमें स्मार्ट बनना होगा, नहीं तो ये चैनल हमें एक विचारधारा का गुलाम बना देंगे।

जो भी सुने, पहले जांचें, फिर मानें। आंख मूंदकर भरोसा करना अब बेवकूफी है।

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