नग्नता की गिरफ्त में युवा: एक संस्कृति संकट


दिन-ब-दिन भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है।
जहाँ पहले लड़कियाँ पर्दे में रहना सम्मान की बात समझती थीं, आज वही लड़कियाँ नग्नता और अंग प्रदर्शन को सम्मान समझने लगी हैं।
लेकिन बात यह नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए—आख़िर मैं कौन होता हूँ ये बताने वाला कि कोई कैसा पहनावा पहने, कैसे जिए, कौन-सा कपड़ा पहने।
किसी का पहनावा उसका व्यक्तिगत चुनाव है, और वह जैसे भी पहनना चाहे, वैसे ही रह सकती है—इसमें किसी और को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

मगर भारतीय समाज अभी भी मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं है।
मैं मानता हूँ कि इससे समाज में व्यभिचार को बढ़ावा मिलेगा, और फिर किसी भी चीज़ पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाएगा।

मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में नशे का चलन जिस तेजी से बढ़ा है, उसने अब भारत के गाँवों को भी चपेट में ले लिया है।

आजकल बात-बात पर गाली देना आम बात हो गई है
व्यक्ति धीरे-धीरे अपशब्दों का प्रयोग करता है, और यही आदत उसकी जुबान को गंदा बना देती है
मतलब, अब लोगों के बोलचाल में संयम नहीं रहा
जब इंसान बार-बार अपशब्दों का प्रयोग करता है, तो उसकी बुद्धि कमजोर हो जाती है, और फिर वह सही-गलत में फर्क करना बंद कर देता है
धीरे-धीरे वह गलत बातों में ही सुख महसूस करने लगता है—यहीं से जन्म होता है व्यभिचार का

जैसे ही कोई व्यक्ति व्यभिचार को सही मानने लगता है, वह विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होता है।
और जब उसे वह व्यक्ति नहीं मिल पाता, तो वह पोर्नोग्राफी जैसी वीभत्स चीज़ों का उपभोक्ता बन जाता है
वहीं से यौन विचारों का जन्म होता है।
कुछ लोग इन भावनाओं पर नियंत्रण पा लेते हैं, मगर जिनका न आहार, न विचार, न शरीर शुद्ध होता है, वे आगे चलकर दुष्कर्म कर बैठते हैं, जैसा कि हमने निर्भया जैसे मामलों में देखा।

ये प्रवृत्तियाँ अब संक्रमण की तरह समाज में फैल रही हैं।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, X (ट्विटर), और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर नग्नता से भरे कंटेंट खुलेआम दिखाए जा रहे हैं।
जब कोई छोटा बच्चा इन्हें देखता है, तो वह बचपन में ही कामरोग से ग्रसित हो जाता है।
जिस उम्र में उसे ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, उस उम्र में वह कामवासना शांत करने के उपाय ढूँढने लगता है

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उपयोगकर्ता की पसंद-नापसंद को ट्रैक करता है और उसे बार-बार वैसा ही कंटेंट दिखाता है।
बॉलीवुड की फिल्में और OTT प्लेटफ़ॉर्म आज ऐसी फ़िल्मों से भरे पड़े हैं, जिनमें नग्नता का स्तर पोर्न के बराबर है
इनमें औरतें अपने पति को धोखा देती हैं, मर्द अपनी पत्नी को धोखा देते हैं।
ये सब कंटेंट इतनी आसानी से उपलब्ध है कि कोई भी इन्हें देख सकता है।

ये फ़िल्में सिर्फ़ अश्लीलता नहीं दिखातीं, बल्कि व्यक्ति को उन्हें वास्तविक जीवन में आज़माने के लिए प्रेरित करती हैं।
और इसका परिणाम हमें सोनम जैसे केसों के रूप में मिलता है।

अब समय आ गया है कि भारत में इस विदेशी, रोगग्रस्त मानसिकता वाले व्यभिचार से भरी फिल्मों पर रोक लगाई जाए।
वरना आज का समाज, जो पहले से ही विचारों की कमी से जूझ रहा है, धीरे-धीरे विनाश की ओर बढ़ जाएगा

भारत आज तक अपने मूल्यों की वजह से जिंदा है, और इन्हीं मूल्यों को पूरी दुनिया खत्म करने पर तुली हुई है—और अफसोस कि हम भी उसमें शामिल हो गए हैं।

बॉलीवुड ने नग्नता का रोग फैलाया है।
2000 से 2010 के बीच, जब इमरान हाशमी की फिल्में सफल होने लगीं, तो बॉलीवुड, जो पहले ही चोरी की स्क्रिप्ट पर फिल्में बनाता था, उसने आइटम सॉन्ग्स को बढ़ावा देना शुरू किया
धीरे-धीरे जब आइटम गाने भी फीके पड़ने लगे, तो उन्होंने फिल्मों में इंटीमेट सीन डालने शुरू किए।
अब जब उससे भी व्यूअरशिप नहीं आ रही, तो वे पूरी तरह नग्नता और सेक्स सीन्स का सहारा ले रहे हैं।

मगर जब ये भी आम हो जाएगा, तो कहानियों की ओर लौटना पड़ेगा
और तब क्या?
बॉलीवुड में तो कहानियाँ बची ही नहीं हैं।
इसीलिए दक्षिण भारतीय सिनेमा आज चल रहा है—क्योंकि वहाँ कहानी अब भी ज़िंदा है।

बॉलीवुड की नग्नता और भद्देपन से एक नया युवा वर्ग प्रेरित हुआ है, जो पूरी तरह पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित है।
सोशल मीडिया पर नग्नता फैलाकर आसानी से व्यूज मिल जाते हैं, जिसने एक कामचोर संस्कृति को जन्म दिया है।

पश्चिमी संस्कृति में तो 13 से 16 साल की उम्र में ही लड़कियाँ अपनी पवित्रता खो देती हैं
भारत में बाल विवाह की परंपरा थी, लेकिन वह किसी कारणवश रोकी गई थी।
जिस उम्र में पढ़ाई करनी चाहिए, अगर उस उम्र में बच्चे व्यभिचार के साधन देखेंगे, तो उसका परिणाम वही होगा जो आज हो रहा है।

इससे बचने का एक ही रास्ता है—खुद को सत्कर्म में व्यस्त रखना।
जब व्यक्ति कर्म में डूबा रहता है, तो उसे ऐसे काम करने की फुर्सत नहीं मिलती

आध्यात्मिकता और ध्यान ही वो मार्ग हैं, जो हमें इन सब चीज़ों से बचा सकते हैं।
वरना इंद्र जैसे देवता भी कामवासना में फँस गए थे, तो मनुष्य तो बहुत ही तुच्छ प्राणी है।

हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आध्यात्मिकता ही बचा सकती है—इसके अलावा कोई और उपाय नहीं है।

Comments

Popular posts from this blog

Can We Remove ‘Secular’ and ‘Socialist’ from the Preamble of the Indian Constitution? | The Real Story

ISLAMIC REVOLUTION : Sexual Violence Against Hindu Girls in Bangladesh

The Dawn Over the Brahmaputra