साहब की इच्छा और बदहाल प्राथमिक शिक्षा

आज मन किया कि चला जाए जनता को जरा उन प्राथमिक विद्यालयों को दिखाया जाए जहा से उत्तीर्ण होकर भारत के बड़े बड़े स्वर्गीय मंत्री ,अधिकारी, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, वैज्ञानिक जैसे इत्यादि महान लोग निकले जिन्होंने भारत की कई वर्षों तक सेवा की और मैं नमन करता हूॅं ऐसी हस्तियों को।
मन में इन हस्तियों का नाम और उनके व्यक्तित्व की आभा सजाए पहुॅंचा प्रदेश के एक ऐसे ही प्राथमिक विद्यालय में।
गया तो देखा कि बाहर एक व्यक्ति घांस छील रहा था। थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा कि स्कूल के हेडमास्टर जी बड़ी ही मेहनत और लगन से बच्चों को पढ़ा रहे थे, मुझे देख कर वो उठे और बोले कि अभी लंच के लिए १५ मिनट शेष हैं और इसलिए वो थोड़ी देर बाद ही उपलब्ध हो पाएंगे।
थोड़ा अंदर गया तो देखा एक छोटा आफिस जहां बाकी ३ शिक्षक बैठकर कुछ पेपर बना रहे थे और तभी उनकी कक्षा की एक विद्यार्थी चल कर आती है और उन पेपर बना रहे शिक्षक से पूछती है, सर अभी कितना देर और काम करेंगे? सर कब पढ़ाएंगे ? सर मैं देखती हूॅं कि आप लोग हमेशा इसी सब काम में फंसे रहते हैं और चाह कर भी पढ़ा नहीं पाते! आज क्या कह रहें हैं?
तभी अध्यापक जवाब देते हैं कि प्रदेश के मुख्य मंत्री का फरमान आया है कि उन्हें ब्लॉक पर सड़क पर टहल रही गाय भैंसो के लिए भूंसा और दाना दान करना है इसी हेतु वो कागज बना रहे हैं कि कितना क्विंटल भूंसा उन्होंने दान किया सिग्नेचर कर के अपने बेसिक एजुकेशन ऑफिसर को देना है।
तभी उस बच्ची के साथ में आया विद्यार्थी जवाब देता है सर भूंसा और टीचर का क्या मेल , भूसा तो यहां के नेता को दान करना चाहिए मगर वो तो ५ साल में एक बार आते हैं और आपका काम है पढ़ाना जो आप कर नहीं पा रहे है।
तभी टीचर जवाब देते हैं, बेटा मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है करना तो पड़ेगा ही नहीं तो नौकरी चली जायेगी।

तभी बच्ची जवाब देती है, सर मुख्यमंत्री ने टीचर को पढ़ाने के लिए रक्खा है तो पढ़ाने का काम करवाए।
भूसा और दाना तो अपने कार्यकर्ताओं से कह कर भी बंटवा सकते हैं।
तभी प्रधानाध्यापक के पास बी.ई.ओ. का फोन आता है कि सरकार ने सभी अध्यापको को कल जन - जन जोड़ो रैली में बुलाया है और जो नहीं आएगा उसका वेतन अवरुद्ध कर दिया जायेगा।
मुझे बड़ी हैरानी हुई कि मतलब जिन शिक्षको को गरीब, पिछड़े, बाबा साहेब के प्रिय दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित, बच्चों को पढ़ाने के लिए रखा गया था उनसे यह सरकार नौकरी का डर दिखाकर रैली तक में बुला रही है।
मतलब जो पीड़ित दलित शोषित वर्ग को मुख्य धारा में लाने की बात चुनावी भाषणों में थी क्या वो बस एक छलावा थी?
मुझे इतना दुःख हुआ कि मैंने वहा से जाने का मन बना लिया जैसे ही मैं बाहर निकलने वाला था कि तभी अचानक सामने दरवाजे के ऊपर बना छज्जा टूट कर गिर गया एक दम सरकार के मुखिया द्वारा किए गए उन्हीं खोखले दावों जैसे जो उन्होने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए थे, जिससे मैं बस बाल–बाल ही बचा।
तभी सारे शिक्षक जो विद्यालय में मौजूद थे वो दौड़ कर मेरा हाल चाल लेने के लिए आए और मुझसे बोले कि आइए कुछ देर बैठ जाइए ऐसा है कि वो छज्जा कई साल पहले ही दरक गया था हमे लगा ही था कि टूट कर गिर जाएगा मगर इतने दिन से गिरा नही मगर आज गिर ही गया चलिए आपकी जान बची वैसे अधिकारियों को पता है की भवन जर्जर है, मगर अभी कुछ टूटा नहीं था तो अधिकारियों ने कोई कार्यवाही नहीं की।

फिर मैं संकोचवश बस सांस रोक कर बैठ ही गया और ऊपर की छत को देखे जा रहा था जिसकी स्थिति भी कुछ ठीक नहीं थी मगर फिर भी वहा अध्यापन हो रहा था दशा ये थी कि वह छत अब गिरी की तब गिरी।
मैं ये सोच रहा था की हे मेरे श्री राम! क्या है ये दशा? इतनी दयनीय स्थिति शिक्षा के मंदिर कि जहां न तो पढ़ने वाला सुरक्षित है और न ही पढ़ाने वाला।
तभी एक शिक्षक तेजी से साइकिल से आता दिखाई दिया, पसीने में तरबतर वह शिक्षक प्रधानाध्यापक से कहता है जो चुनाव आयोग के कहने पर सरकार ने गांव के वोटर्स की सूची बनाने को कहा था वो बन गई और मैं ले आया! गर्मी बहुत है!
उसी के पीछे एक आदमी जो घांस छील रहा था वो भी दौड़कर आया, मैं सोचा बेचारा सफाई कर्मचारी काम कर के थक गया होगा तो पानी पीने आया है,
मगर!
जब वह व्यक्ति बगल की कक्षा में पढ़ते हुए बच्चों से बोलता है कि कक्षा कार्य सम्पन्न हुआ कि नहीं, मैने बगल खड़े एक शिक्षक से पूछा की कौन है ये? 
जो उस अध्यापक ने मुझे बताया जिसे मैंने जब सुना, तब तो मेरे होश ही उड़ गए कि वो आदमी जो घास छील रहा था वह कक्षा २ के बच्चों को गणित पढ़ाता है और आज प्रधान के घर रामायण है तो उस स्कूल का सफाईकर्मी ग्राम प्रधान के घर मंजीरा बजाने गया है और जिसकी वजह से स्कूल के शिक्षक को घांस छीलनी पड़ रही थी।
मैं वहां खड़ा ही था की वह शिक्षक महोदय जो घांस छील रहे थे वो भाग कर नल पर जाते है और कपड़ा निकाल कर नहाने लगते हैं, मैने पूछा नहा क्यों रहे हैं तो बगल खड़े शिक्षक ने बताया "ऐसा है आज उनका शौचालय साफ करने का टर्न भी था"।

मैंने फिर पूछ ही लिया वहा बैठे अध्यापकों से कि क्या क्या अतिरिक्त काम करने पड़ते हैं आप सभी को और जब उन्होंने मुझे बताया तो मैं सुनता ही रह गया उन्होंने बताया कि प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के निम्नलिखित काम हैं,
1.पोलियो ड्राप पिलवाना,
2.आवारा पशुओं को पकड़वाना,
3.सरकारी रैली में जाना,
4.विश्व योग दिवस पर जिला में योगा करने के लिए 5.भीड़ बढ़ाना,
6.चारा भूंसा देना,
7.चुनाव से पहले वोटर लिस्ट बनवाना,
8.गांव के बच्चों की बाल गणना करना,
9.विद्यार्थियों एवं अभिवावकों का आधार बनवाना तथा उन आधारों को सत्यापित करना,
10.मिड डे मील में भोजन बनवा कर खिलाना,
11.दूध फल सब्जी खरीदकर मंडी से लाना,
12. पुस्तकें बांट कर ऑनलाइन फीड करना,
13. अभिवावक का आधार बैंक से सीड करवाना,
14 .बाल गड़ना करना,
15. जन गड़ना करना,
16. बिना सफाई कर्मचारी के लैट्रिन साफ करना,
17. पेयजल की समुचित व्यवस्था करना,
18. घर घर सर्वे करना,
19.हर चौथे दिन मीटिंग करना,
20. ट्रेनिंग करना,
21. चुनाव के पहचान पत्र बांटना,
22. चुनाव की पर्ची बांटना,
23. चुनाव में ड्यूटी करना,
24. ईवीएम की काउंटिंग में जाना,
25. विद्यालय की मरम्मत करवाना,
26. टूटी खिड़की दरवाजा बनवाना,
27. पुरानी बिल्डिंग तोड़वाना,
28. पुरानी बिल्डिंग की नीलामी करवाना,
29 .नीलामी के लिए ढोल, डफ़ली मंजीरा बजाते हुए गांव गांव घूमकर नीलामी का सन्देश देना
30. बोर्ड के एग्जाम की ड्यूटी करना भले खुद के 31.स्कूल के बच्चों का परीक्षण कार्य ही क्यों न छोड़ना पड़ जाए।
32. नेता मंत्री साधू का भाषण हो तो भीड़ इकट्ठा कर के वहा आए लोगों को जलपान करवाना,
33. कावड़ यात्रा में यात्रियों को सेवा देना,
34. सरकार द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह में मेकप एवम मेंहदी लगाना
35. पेड़ लगाना,
36. घांस छीलना, झाड़ काटना झाड़ू  लगाना।

और अंत में सबसे महत्वपूर्ण काम,  समय मिलने पर पढ़ाई करवाना और बच्चों को प्रवाह पूर्ण पठन करवाना जैसे काम करने पड़ते हैं ।

यह सब सुनकर मैं वहा चुप बैठा बस यही सोच रहा था की हे मेरे अयोध्या वाले श्री राम, हे मेरे काशी के महादेव और हे मेरे मथुरा के श्री कृष्ण क्या हाल हो गया है इस शिक्षा मंदिर का जहां के अध्यापको का काम है गरीब, शोषित पीड़ित वंचित बच्चों को पढ़ाना उन्हें पढ़ाई के साथ साथ कैसे कैसे अतिरिक्त काम करने पड़ रहें है जिसके लिए सरकार को अलग से पद निकालने चाहिए मगर उन व्यर्थ के कामों को शिक्षक से करवाया जा रहा है।
ये सब देख सुनकर ये लग रहा था कि जिस सनातन के वेदों में गुरुओं के आदर की बात कही गई है और यह सरकार जो सनातन की पर्सनल सेक्रेटरी बनकर घूम रही है और उसके नाम पर वोट की भीख मांग रही है वो ही सरकार शिक्षकों की इस बदहाली की जिम्मेदार है।
जिस सनातन हिन्दू संस्कृति में लिखा है–
गुरु ब्रह्मा  गुरु विष्णु , गुरु देवो महेश्वरा, 
गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः
जिसका मतलब है कि गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है, ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं.
इन गुरुओं को सरकार प्रणाम भले मत करे मगर! कम से कम भस्मासुर बनकर, इनके सर पर बैठकर रोज नए नए हथकंडों से इन्हें परेशान तो न करे ।

जब शिक्षक बच्चों को पढ़ा ही नहीं पाएंगे तो कैसे इस देश का भविष्य सुधरेगा, मेरे अन्दर रचे बसे पूर्वाग्रह जोकि समाचार पत्र, समाज के लोगों की कड़वी बातों से उत्पन्न हुआ रोष सरकार द्वारा चलाए जा रहे शिक्षकों के विरुद्ध सोशल मीडिया कैंपेन का हुआ विपरीत असर जो अब काफी हद तक समाप्त हो चुका था अब मैं भी इन शिक्षकों का दर्द समझ पा रहा था जो मैं कभी कभी कुछ ईमानदार शिक्षकों के मुंह से सुना करता था।
मैंने वहां के शिक्षको प्रणाम किया और अपने मन में उन लाखों शिक्षकों के लिए आदर भाव लिए निकल गया बस अड्डे पर जहा से मुझे अपने नानी गांव जाना था।
वैसे बस अड्डे से याद आया कि जब मैं छोटा था तो मेरे गांव में जो बस अड्डा था वो काफी बड़ा हुआ करता था और जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ ये छोटा हो गया अब आप सोच रहे होंगे कि छोटा कैसे हो गया वो ऐसे जनाब की बस अड्डा जो था आधी सरकार की जमीन पर था आधी वहा के लोगों की तो लोगों ने अपनी जमीन पर घर बनवा लिया और सरकार की जमीन पर कब्जा कर लिया हां हां अब आप सोच रहे होंगे कि किसी में थाने पर शिकायत क्यों नही की तो मैं आपको बता दूं कि बस अड्डा एक दम थाने के पास था और थाने के पास ऐसा कांड हो जाए तो भला कौन कोतवाल एफ आई आर लिखेगा अरे साहब उसी की नौकरी चली जायेगी।
खैर मुझे कौन सा रोज रोज बस अड्डे पर जाना था।
मेरी बस आ गई और मैं अपने नानी गांव जो की बिजनौर जिले में था वहा के लिए निकल पड़ा हां एक बात मुझे सुबह से खुशी देने वाली ये थी कि मुझे जो बस मिली वो बहुत ही अच्छी स्थिति में थी और सफर के लिए उचित थी और दूसरी अच्छी चीज ये थी कि अब मैं नितिन गडकरी जी द्वारा बनवाई गई उन तमाम सड़कों को देख पाऊंगा जो की मैने टीवी पर देखी थी।
मैं बस में बैठा तो था मगर अब भी मुझे मेरे बचपन के प्राथमिक विद्यालय की स्थिति खाए जा रही थी।
खैर मुझे कौन सा शिक्षण करना था मैं तो गया था अपना स्कूल देखने ऐसा कह कर अपनें मन को शांत कराया और कब मुझे झपकी लग गई पता ही नही चला वैसे सफर में नीद तो लग ही जाती है और वो भी तब और लगती है जब आप उसकी उत्सुकता में रात भर सो नहीं पाए हों।
सोते–सोते कब मैं बिजनौर पहुंच गया मुझे पता ही नही चला और फिर मैं केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई अच्छी सड़क को नहीं देख पाया एक दम उसी तरह जैसे मेरे शहर का स्मार्ट सिटी में तब्दील होना। जिसके बनने का सुख हम आज भी प्रत्यक्ष में नहीं बल्कि अखबारों की हेडलाइंस के जरिए ही भोग पाते हैं । स्मार्ट सिटी तो अब बनने से रही । मैं सारी गलती का ठीकरा नीद पर ही नही फोडूंगा ऐसा है की मेरे दो घंटे जिसमे मैं आस पास की सड़क , मौसम पेड़ पत्ते को देख सकता था वो मैं रील के रैबिट होल में फंस जाने की वजह से नहीं देख पाया।
चलिए अब मुझे आगे उतरना है।
दोस्तों मैं उतर गया हूॅं, इंतेज़ार कर रहा हूं मेरे मामा के लड़के छुट्टन का।
आइए जब तक छुट्टन नहीं आता है तब तक जरा आस पास की चीजों का मज़ा लेते हैं, देखिए दोस्तों मजा तो तभी है जब कुछ मजेदार देखने को मिले।
मैं मज़ा लेने जा ही रहा था कि तभी छुट्टन पीछे से किसी ने हॉर्न बजाया मैंने मुड़ कर देखा तो पाया कि छुट्टन था।
मैं भी क्या करता मुड़ कर बैठ गया उसकी मोटर साइकिल के पीछे और निकल पड़ा अपने नानी के गांव मैं रस्ते में जा रहा था धीरे धीरे जैसे मैं आगे बढ़ने लगा तो पानी बढ़ता जा रहा था। अब पानी से मैं अब आपको बता दूं ये पानी आर ओ का नहीं ये पानी है बाढ़ का।
मैंने छुट्टन से पूछा का भइया छुट्टन का है ई कुल तो छुट्टन ने बताया कि ई कुल बाढ़ का परिणाम है भैया जो इस बार बांध के टूटने से आई है।
मैं आगे बढ़ा तो देखा कि चार दिलेर बाढ़ में तैर कर कहीं जा रहे थे और हंसी की बात यह थी कि कपड़ा जो पहना था वह था सफेद शर्ट और नीचे का हिस्सा तो पानी में था मगर फ़िर भी मैं आदजे से ये लगा कि कि कुछ काले ही रंग का पहना होगा।
हमारे भी गाड़ी का पहिया पानी में ही था और मैने सोचा कि पूछ लिया जाए कि हैं ये दिलेर और जब मैने पूछा तो पाया कि वो चार दिलेर प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक थे जो बाढ़ में तैर कर अपना अटेंडेंस लगाने और सेल्फी खींचकर अपने साहब को भेजने जा रहे थे।
भाई मैं तो हैरान और परेशान हो गया यह सब देख कर।
मैं अभी तक सोच रहा थी यह शिक्षकों की अवस्था केवल मेरे ज़िले तक सीमित है मगर भइया यह पूरे प्रदेश की स्थिति है।
कुछ तो करना होगा वरना ऐसे तो केवल मरना होगा या उसके बाद धरना होगा और मर गए तो परिवार को लोन और कर्ज लेकर चलना होगा मग़र क्या बताया जाए प्राथमिक शिक्षकों को मरने के बाद भी मुआवजा नहीं मिलेगा क्यों? क्योंकि उन्हें राज्य कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं है।

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